भारतीय संसद: सदस्य, कार्य और सत्र

पार्लियामेंट(जिसे संसद या भारतीय संसद के नाम से भी जाना जाता है), भारत का सर्वोच्च विधायी अथॉरिटी है। भारत की संसद, राष्ट्रपति के साथ दो सदन – लोक सभा (हाउस ऑफ पीपल) और राज्य सभा (राज्यों की परिषद)में विभाजित होती है। भारत के राष्ट्रपति के पास, संसद के सदन को बुलाने या लोकसभा को भंग करने की शक्ति है। कोई विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित होने के बाद ही एक अधिनियम बनता है। भारतीय संसद भवन को 1912-1913 में ब्रिटिश आर्किटेक्ट(वास्तुकार) सर एडविन लुटियन और सर हर्बर्ट बेकर द्वारा डिजाइन किया गया था। इसे 1927 में सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली, काउंसिल ऑफ स्टेट्स और चैंबर ऑफ प्रिंसेस के लिए खोला गया था।

भारत के संसद सदस्य

राज्यसभा

राज्य सभा सदस्यों की अधिकतम संख्या 250 है। 238 सदस्य राज्य द्वारा चुने जाते हैं और 12 सदस्यों को राष्ट्रपति द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए नामित किया जाता है। राज्य सभा एक स्थायी निकाय है और भंग नहीं होता है। हालाँकि, राज्यसभा के कुल सदस्यों में से एक-तिहाई सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते हैं, और उनकी जगह नए चुने गए सदस्य होते हैं। राज्य सभा में प्रत्येक सदस्य छह वर्ष की अवधि के लिए चुने जाते हैं।

लोकसभा

लोकसभा या संसद का निचला सदन उन लोगों के प्रतिनिधियों से बनता है, जो प्रत्यक्ष चुनाव के बाद यूनिवर्सल एडल्ट सफ़रेज के आधार पर चुने जाते हैं। लोकसभा सदस्यों की अधिकतम संख्या 552 हैं – राज्यों का प्रतिनिधित्व करने के लिए 530 सदस्य, केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने के लिए 20 सदस्य और एंग्लो-इंडियन समुदाय से 2 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नामित किए जाते हैं। लोकसभा के वर्तमान सदस्यों की संख्या 545 है। लोकसभा के सदस्य अपनी सीट पर 5 साल तक या जब तक मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा भंग नहीं हो जाती है, तब तक बने रह सकते है।

भारत की संसद के कार्य:

संसद के कार्यों को कई श्रेणियों के तहत वर्गीकृत किया जा सकता है, जैसे कि विधायी कार्य, कार्यकारी कार्य, वित्तीय कार्य आदि।

विधायी कार्य

  1. संसद उन सभी मामलों पर कानून बनाती है जिनका उल्लेख संघ और समवर्ती सूची में किया गया है।
  2. समवर्ती सूची के मामले में, जहां राज्य विधानसभाओं और संसद का संयुक्त अधिकार क्षेत्र है, संघ का कानून राज्यों पर लागु रहेगा जब तक कि राज्य के कानून को पहले राष्ट्रपति से स्वीकृति नहीं मिली हो। हालाँकि, संसद किसी भी समय, राज्य विधायिका द्वारा बनाए गए कानून में कुछ जोड़ सकती है या संशोधन कर सकती है।
  3. संसद निम्नलिखित परिस्थितियों में राज्य सूची के मामलों पर कानून पारित कर सकती है।
    • यदि कोई आपातकाल लगा हो, या किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागु हो, तो संसद राज्य सूची के मामलों पर भी कानून बना सकती है।
    • संसद राज्य सूची के मामलों पर कानून बना सकती है यदि संसद का ऊपरी सदन अपने वर्तमान सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से एक प्रस्ताव पारित करता है और मतदान करता है, तो संसद के लिए आवश्यक है कि वह राज्य सूची में शामिल किसी भी मामलों पर राष्ट्रीय हित में कानून बनाए।
    • संसद राज्य सूची के मामलों पर कानून पारित कर सकती है, यदि यह अंतर्राष्ट्रीय समझौतों या विदेशी शक्तियों के साथ संधियों के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक है।
    • यदि दो या दो से अधिक राज्यों की विधानसभाएं इस आशय का प्रस्ताव पारित करती हैं कि राज्य सूची में सूचीबद्ध किसी भी मामलों पर संसदीय कानून होना श्रेयकर है, तो संसद उन राज्यों के लिए कानून बना सकती है।

कार्यकारी कार्य (कार्यपालिका पर नियंत्रण) 

सरकार के संसदीय रूप में, कार्यपालिका, विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है। इसलिए, संसद कई उपायों द्वारा कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है।

  1. अविश्वास प्रस्ताव से, संसद कैबिनेट(कार्यकारिणी) को सत्ता से बाहर कर सकती है। यह किसी बजट या किसी अन्य विधेयक के प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर सकती है, जो कैबिनेट द्वारा प्रस्तुत किया गया हो।
  2. संसद सदस्य, मंत्रियों से उनके कार्यकाल और आयोगों पर सवाल पूछ सकते हैं। सरकार की ओर से किसी भी तरह की चूक को संसद में उजागर की जा सकती है।
  3. संसद, मंत्री के आश्वासन पर एक समिति नियुक्त करती है, जो मंत्रियों द्वारा संसद में किए गए वादों को पूरा होने या या नहीं होने पर नजर रखता है।
  4. निंदा प्रस्ताव: सरकार की किसी भी नीति को दृढ़ता से अस्वीकार करने के लिए सदन में विपक्षी दल के सदस्यों द्वारा एक निंदा प्रस्ताव पारित किया जाता है। इसे केवल लोकसभा में ही स्थानांतरित किया जा सकता है। निंदा प्रस्ताव पारित होने के तुरंत बाद, सरकार को सदन का विश्वास प्राप्त करना होता है।अविश्वास प्रस्ताव के मामले से भिन्न इसमें, यदि निंदा प्रस्ताव पारित हो जाता है तो मंत्रिपरिषद को इस्तीफा देने की आवश्यकता नहीं होती है। 
  5. कट मोशन(कटौती प्रस्ताव): इस प्रस्ताव का इस्तेमाल सरकार द्वारा लाए गए वित्तीय विधेयक में किसी भी मांग का विरोध करने के लिए किया जाता है।

वित्तीय कार्य

जब वित्त की बात आती है, तो संसद को सर्वाधिक अधिकार होता है। संसद से अनुमोदन के बिना कार्यकारी एक पाई भी खर्च नहीं कर सकते।

  1. कैबिनेट द्वारा तैयार किया गया केंद्रीय बजट संसद द्वारा अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किया जाता है। कर लगाने के सभी प्रस्तावों को भी संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए।
  2. संसद की दो स्थायी समितियाँ (लोक लेखा समिति और प्राक्कलन समिति) हैं, जो इस बात की जाँच करती हैं कि विधायिका द्वारा दिए गए धन को किस प्रकार खर्च किया गया है।

संशोधन की शक्तियाँ:

संसद के पास भारत के संविधान में संशोधन करने की शक्ति है। संसद के दोनों सदनों के पास समान शक्तियां हैं। संशोधन को प्रभावी बनाने के लिए उसको लोकसभा और राज्यसभा दोनों में पारित करना होता है।

चुनावी कार्य:

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी संसद भाग लेती है। राष्ट्रपति का चुनाव करने वालों में अन्य के साथ दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य भी शामिल होते हैं। राष्ट्रपति को राज्य सभा द्वारा एक प्रस्ताव पारित करके और लोकसभा की सहमति से हटाया जा सकता है।

  • न्यायिक कार्य

सदन के सदस्यों द्वारा विशेषाधिकार हनन के मामले में, संसद के पास उन्हें दंडित करने की शक्तियाँ हैं। विशेषाधिकार का उल्लंघन सांसदों द्वारा प्राप्त विशेषाधिकारों में से किसी का उल्लंघन है।

  1. सदस्य द्वारा विशेषाधिकार प्रस्ताव को तब लाया जाता है, जब उसे लगता है कि कोई सदस्य/मंत्री ने सदन के विशेषाधिकार का हनन किया है।
  2. संसद द्वारा अपने सदस्यों को दंडित करने की शक्ति आमतौर पर न्यायिक समीक्षा का विषय नहीं होती है।
  3. संसद के अन्य न्यायिक कार्यों में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, उच्च न्यायालयों, महालेखा परीक्षक आदि पर महाभियोग लगाने की शक्ति शामिल है।

संसद के सत्र

भारतीय संसद का एक संसद सत्र वह अवधि है जिसके दौरान देश के प्रबंधन के लिए सदन लगभग हर दिन बैठती है। आम तौर पर एक वर्ष में 3 सत्र होते हैं। संसद सत्र के लिए संसद के सभी सदस्यों को बुलाने की प्रक्रिया को संसद सत्र बुलाना कहा जाता है। राष्ट्रपति, संसद सत्र बुलाता है।

  1. संसद का बजट-सत्र (फरवरी से मई)
  2. संसद का मानसून सत्र (जुलाई से सितंबर)
  3. संसद का शीतकालीन सत्र(नवंबर से दिसंबर)

संसद का बजट-सत्र:

  1. संसद का बजट सत्र फरवरी से मई तक आयोजित होता है।
  2. 2017 के बाद से, केंद्रीय बजट हर साल फरवरी के पहले दिन पेश किया जा रहा है। इससे पहले, इसे फरवरी के अंतिम दिन प्रस्तुत किया जाता था।
  3. वित्त मंत्री द्वारा बजट पेश किए जाने के बाद सभी सदस्य बजट के विभिन्न प्रावधानों और कराधान से संबंधित मामलों पर चर्चा करते हैं।
  4. अधिकतर बजट सत्र के दो अवधियों में विभाजित होता है, जिनके बीच एक महीने का अंतर होता है।
  5. सत्र दोनों सदनों के राष्ट्रपति के अभिभाषण से शुरू होता है।

संसद का मानसून सत्र:

  1. संसद का मानसून सत्र हर साल जुलाई से सितंबर तक आयोजित किया जाता है।
  2. यह बजट सत्र के दो महीने के बाद शुरू होता है।
  3. इसमें सार्वजनिक हित के मामलों पर चर्चा की जाती है।

संसद का शीतकालीन सत्र:

  1. संसद का शीतकालीन सत्र नवंबर के मध्य से दिसंबर के मध्य तक आयोजित किया जाता है।
  2. यह तीनों सत्रों में सबसे छोटा सत्र है।
  3. यह सत्र उन मामलों को उठाता है जिन पर पहले विचार नहीं किया जा सका था और संसद के दूसरे सत्र के दौरान विधायी कार्य की अब्सेंस के लिए मेक अप किया जाता है।

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